आजाद महाकाव्य- 09, 10, 11
महाकाव्य
चन्द्रशेखर आजाद
-रचनाकार
श्रीकृष्ण सरल
[9]
लखनऊ
खुली बगावत
लखनऊ नाम, क्या आप कहेंगे नगर मुझे?
जी नहीं, कृपा करके मुझको नगरी कहिए।
मन ऊब गया हो अगर आपका जीवन से,
तशरीफ लाइए, आप यहाँ आकर रहिए।
देखेंगे मेरा रूप, `वाह!' कह बैठेंगे
संभव है चोरी-छिपे आह भी भर लेंगे।
सपने, जो छलते रहे आपको अब तक हैं,
वे अपने सपने आप यहाँ सच कर लेंगे।
इस कदर घूर कर आप देखते क्यों मुझको,
छलछला उठी क्यों प्यास हृदय की आँखों में?
परिचय पाने को उत्सुक हों, तो सुनिएगा,
मैं ऐसी वैसी नहीं, एक हूँ लाखों में।
मैं किसी मेंढ़ पर खिला जंगली फूल नहीं,
मैं स्निग्ध सुमन की कोमल मृदुल पाँखुरी हूँ।
मैं नहीं सिपाही जैसा खड़ा तानपूरा,
ज;तद्ध अधर-शयन करती, मैं वही बाँसुरी हूँ।
मैं रूप-रंग की नहीं चटख भर ही केवल,
मैं सिक्त-सुरभि सी, जो मन को हुलसाती है।
मैं दूध-नहाई हुई चाँदनी की फिसलन,
वह धूप नहीं मैं, जो तन को झुलसाती है।
मैं नहीं किसी के फूहड़ अट्टहास जैसी,
मैं लजवन्ती मुस्कानों की मृदु सिहरन हूँ।
मैं किसी रूप के प्यासे की हूँ नजर नहीं,
अध-खुले नयन की बाँकी-तिरछी चितवन हूँ।
अरमान भीड़ बनकर बौराए-से फिरते,
अव्यक्त खुमारी-सी मन पर छा जाती है।
सुरमई किनारी की सिन्दूरी साड़ी में,
जब नेह-निमन्त्रण-सी संध्या आ जाती है।
हैं नाज और नखरे मेरे आभूषण, पर,
मशहूर नहीं केवल लखनवी नजाकत है।
जब कभी जुल्म की छाया मुझ पर पड़ती है,
हर चितवन ही वन जाती खुली बगावत है।
लावा बन जाता खून खौलता हुआ, और,
विस्फोट अनय की लघु आहट बन जाती है।
हर शोख अदा करती विद्रोह भयानक है,
हर भाव आग, हर साँस लपट बन जाती है।
यदि सुनी आपने हो चर्चा सत्तावन की,
यदि पृष्ठ पलट कर देखें हों इतिहासों के।
मेरे विद्रोही पैरों ने मुँह कुचले थे
नापाक इरादे लिए खून के प्यासों के।
तब थिरक उठे थे पाँव, जवानी नाची थी,
लहलह करते जलते भीषण अंगारों पर।
धड़ से फिरंगियों के सर उछल-उछल पड़ते,
जब हाथ जवानों के पड़ते तलवारों पर।
आँखों में उतरे हुए खून की सुर्खी ले,
रण-खेतों में जब मेरे शेर उतरते थे।
अंग्रेज लड़ाके बख्शो! बख्शो! चिल्लाते,
नापाक इरादे तौबा ! तौबा! करते थे।
मैं वही लखनऊ, मुझमें वही खून अब भी,
बरजोर खून में अब भी वही रवानी है।
हर बूँद खून की, है पागल तूफान लिए,
हर बूँद, जोश की जलती हुई निशानी है।
हाँ, एक बात रह गई और वह भी कह दूँ,
अंग्रेज हुकूमत ने फिर मुँह की खाई थी।
अपने आँचल से मैंने तेज हवा की थी,
जब आग क्रान्तिकारी दल ने भड़काई थी।
वे मुट्ठी भर, लेकिन पहाड़ से टकराए,
साम्राज्यवाद की कैसी शान उछाली थी।
दुनिया के आगे बड़ी नाक वाले बनते,
उस बड़ी नाक में उनने कौड़ी डाली थी।
काकोरी कहता, क्रांतिकारियों ने उनकी,
गाड़ी तो क्या, सचमुच इज्जत ही लूटी थी।
जब रास खींच कर उसे रोक ली, तो उनकी
छूटती कहाँ से गाड़ी, नाड़ी छूटी थी।
वह लुटी-पिटी गाड़ी आई रोती-रोती,
वे क्रांति-वीर आए इठलाते मदमाते।
अपनी आँखों से मैंने दोनों को देखा,
वे दिन रह-रह कर अब भी मुझे याद आते।
बिस्मिल, उफ कैसा विकट हौसला था उसमें,
वह जान झोंक देने में औरों से बढ़कर।
अशफाक चाँद-सूरज का एक नमूना था,
वह चमक उठा, शासन की छाती पर चढ़कर।
रोशन, बहादुरी को रोशन करने आया,
वह अक्खड़ता है अब न देखने को मिलती।
राजेन्द्र गजब की अलमस्ती उसने पाई,
जो उसे देखता, मन की कली-कली खिलती।
आजाद, नहीं मिलती उसकी कोई मिसाल,
क्या विकट दिलेरी और बला की तेजी थी।
कुछ खास तौर से अपने हाथों से गढ़कर,
वह हस्ती मालिक ने दुनिया में भेजी थी।
वह झूम-झूम कर चलना, उसका इठलाना,
वह जोखिम में उसका आगे-आगे रहना।
वह शान, बहुत मुश्किल करना उसका बयान,
वह वतन-परस्ती उसकी, उसका क्या कहना।
अफसोस! जाल में उलझ गए उनमें से कुछ,
फिर हुआ न्याय का नाटक, जैसे होता है।
वे झूल गए फन्दों पर हँसते-हँसते ही,
दिल करके उनकी याद आज भी रोता है।
आजाद, नाम जैसा खुद भी आजाद रहा,
अंग्रेज हुकूमत छू न सकी उसकी छाया।
वह आँख-मिचौनी रहा खेलता उससे ही,
था नोच रहा खंभा, वह शासन खिसियाया।
-०००-
[10]
विकट हौसला
ले रहे आप रुचि हैं मेरी इन बातों में
इसलिए कर रहा दिल, कुछ और सुनाऊँ मैं।
आजाद किस तरह लुकाछिपी खेला करता,
कुछ और करिश्में देखे हुए, दिखाऊँ मैं।
आ सकी न कोई उसके दिल में दुर्बलता,
आती कैसे, वह शक्ल देख घबराती थी।
धीरता डालती थी उस पर अपने डोरे,
वीरता निछावर उस पर हो-हो जाती थी।
शासन की आँखों में वह धूल झोंकता था,
पानी में रहकर बैर मगर से करता था।
जब कमजोरी उसके दिल में थी आ न सकी,
डर भी उसके दिल में आने से डरता था।
स्वछन्द पवन जैसी-उसकी इच्छाएँ थीं,
अरमान अग्नि-मुख-पर्वत जैसे बलशाली।
उसकी गतिविधियाँ होनहार की गति जैसी,
आजाद शत्रु के लिए बना करता बाली।
उस दिन उसके मन में यह इच्छा तड़प उठी,
अशफाक जेल में है, उससे मिल आऊँ मैं।
दो बातें करना सचमुच अगर पाप है तो,
दर्शन करके ही जी की जलन मिटाऊँ मैं।
इच्छा का अंकुर उगा, पात फूटे-फैले,
जीवन लहराया, फूलों ने थे फल पाए।
जेलर साहब ने सुना, वहाँ उनसे मिलने,
कोई अच्छे-खासे तगड़े लाला आए।
बंदगी हुजूरे आली! मैं साहू चन्दर,
हाजिर हूँ अपने वतन बड़ौदा, से आकर।
सोचा, हुजूर की खिदमत में कुछ अर्ज करूँ,
मैं देखूँ अपना भाग्य यहाँ भी अजमा कर।
मैं मूँगफली का बहुत बड़ा व्यापरी था,
पिट गया सभी व्यापार, दिवाला निकल गया।
सोचा, दुर्दिन में घर से दूर रहूँ, चलकर,
रोजी-रोटी के लिए करूँ कुछ काम नया।
सुनते हैं, रसद कैदियों को जो दी जाती,
यह काम दिया जाता है ठेकेदारों को।
इस साल इनायत हो मुझ पर गरीब परवर।
मिल जाये रोटी हम जैसे बेचारों को।
जो सिफ्त काम में मेरे, वह भी बतला दूँ,
वह रसद, जे के कैदी यद्यपि खाएँगे।
पर असर पडेग़ा रसद बाँटने वालों पर,
वे मुझ जैसे मोटे-तगडे हो जाएँगे।''
``लालाजी! यह दिल्लगी नहीं, गर सच है तो,
हम कोशिश करके काम तुम्हें दिलवाएँगे।
पर खौफ हमें, यदि अनशन कर बैठ कैदी,
तो क्या उन जैसे पिचक नहीं हम जाएँगे।''
लाला बोले, ``मैं शक्ल देख कर कह सकता,
खाएगा गुपचुप कौन, कौन चिल्लाएगा।
जब अनशन करने की नौबत आएगी, तो,
उसका इलाज भी उस जैसा हो जाएगा।``
जेलर साहब ने साथ लिया लालाजी को,
ले चले दिखाने कैदी और कैदखाना।
वे सोच रहे थे यह बकरा फँस जाए, तो
पक जाएगा अपना भी अच्छा नजराना।
क्या पता, जिसे वे बकरा समझ रहे थे, वह
नाखून छिपाए, बबर शेर का चाचा था।
शासन के मुँह का घाव अभी भी भरा न था,
जब काकोरी में उसने जड़ा तमाचा था।
आतुर जिसके हित बन्दी-गृह की दीवारें,
शासन की सुरसा भूखी जिसे लील जाने।
वह खड़ा उन्हीं के बीच प्राण-जैसा तन में,
उन्नत ग्रीवा, नि:शंक, निडर, सीना ताने।
अशफाक देखकर उसको, क्षणभर को चौंका,
पण्डितजी कैसे यहाँ, कलेजा काँप गया।
पर समझ गये, हौसला इन्हें ले आया है,
क्या उनके दिल में है, वह यह भी भाँप गया।
जो कुछ आँखों ने कहा, सुना वह आँखों ने,
मुख और कान, दोनों अवयव बेकार हुए।
रीझे-खीझे, उलझे-सुलझे, भर-भर आए,
दिल एक-दूसरे पर इस तरह निसार हुए।
पिंजड़ा मलता रह गया हाथ, उसका शिकार
वह चला गया बाहर, उसके भीतर आकर।
जेलर समझा, उँगली से पहुँचा पकडेंग़े,
पर लाला खिसका, साफ अँगूठा दिखलाकर।
-०००-
[11]
झाँसी
मौत की माँग
मैं झाँसी, दुश्मन के मंसूबों की फाँसी,
मैं ज्योति वीरता के ज्वलन्त आदशों की।
स्वातंत्र्य हेतु तलवार सान पर चढ़ी हुई,
जीवंत प्रेरणा मैं भीषण संघर्षों की।
मेरी मिट्टी में बारूदी विस्फोट सजग,
हर कंकड़ है मेरा, बलिदान-कहानी है।
हर पत्थर है बेजोड़ वीरता का स्मारक,
मैं वह, जिसमें पर्याय आग, का पानी है।
मैं वह, जिसकी बरजोर हवाओं में बिजली,
जिसकी हर पत्ती के हैं तेवर तने हुए।
जिससे टकरा कर मौत स्वयं मुँह की खाए,
मेरे बेटे हैं उसी धातु के बने हुए।
तलवार हाथ में लिए बुन्देला टूट पड़े,
दुश्मन पर्वत भी हो तो वह हट जाएगा।
वह टूट जायगा किन्तु झुकेगा नहीं कभी,
धरती के हित वह खड़ा-खड़ा कट जाएगा।
यदि नाम पूछना हो मेरा, तो सुनो पथिक!
लन्दन वालों से पूछो, वे बतलाएँगें।
झाँसी कहने के पहले थर-थर काँपेंगे,
लेते ही मेरा नाम, घाव हरियायेंगे।
जब डींग मारते हों वे कभी वीरता की,
ले दो झाँसी का नाम, मुर्दनी छाएगी।
वे भले भूल जाएँ अपने राजा-रानी,
झाँसी की रानी नहीं भुलाई जाएगी।
मैं झाँसी, मेरा नाम स्वयं इतिहास एक,
अक्षर-अक्षर बलिदान कहानी कहता है।
जब कभी देश का मान दाँव पर लगता है,
मेरा विद्रोही खून नहीं चुप रहता है।
मेरी मिट्टी के आगे सोना मिट्टी है,
मेरी मिट्टी, हर देश-भक्त को चन्दन है।
हर कण सजीवता की जीवित परिभाषा है,
हर क्षण जीवन का सर्वोपरि अभिनंदन है।
जिनके अंतर में देश-भक्ति की अमर ज्योति
वे दीवाने, मेरे दर्शन को आते हैं।
उनकी भावुकता मेरे लिए समस्या है,
मेरी मिट्टी, वे अपने शीष चढ़ाते हैं।
आया था ऐसा ही दीवाना एक कभी,
शायद उसने कुछ आक-धतूरा खाया था।
सब लोग माँगते सुखी, दीर्घ अच्छा जीवन,
वह मुझसे अच्छी मौत माँगने आया था।
बोला, माँ! दे सकती हो तो यह वर दे-दे,
आजादी के तेरे सपने साकार करूँ।
आलेख प्रेरणा की जो रहे पीढ़ियों को,
जो मरदों को जीवन दे, ऐसी मौत मरूँ।
रह गई स्तब्ध, जब मैंने उसकी माँग सुनी,
`हाँ या ना' इनमें से कुछ भी कैसे कहती।
जिसने मुझको माँ कह, मेरी पद-रज ली थी।
माँ बनकर उसकी मौत भला कैसे सहती।
`ना' भी इसलिए नहीं मेरे मुँह से निकला,
युग-ध्वनि उसकी वाणी में मुझे सुनाई दी।
आजादी की तस्वीर गढ़ी थी जो मैंने,
उसके संकल्पों में मुझको दिखलाई दी।
मैं इतना ही कह सकी यशस्वी रहो वत्स!
तेरा जीवन, मेरे सपनों की गोद पले।
क्या कहूँ मौत की मौत नहीं, वह जीवन हो,
तेरे इच्छा-पथ पर वह सहमी हुई चले।
-०००-
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