चन्द्रशेखर आजाद-15,16,17,18,19,20,21,22
चन्द्रशेखर आज़ाद महाकाव्य
भाग-
15
कानपुर
प्राणों की मशाल
मैं शहर कानपुर, भारत का उद्योग नगर,
मैं वह साँचा हूँ, जिसमें लक्ष्मी ढलती है।
मैं पल भर भी थक कर विश्राम नहीं लेता,
दिन-रात, सुबह या शाम जिन्दगी चलती है।
मेरे जीवन का मूल-मन्त्र केवल श्रम है,
गंगा जैसा ही पावन मुझे पसीना है।
यदि आप कहें, यह जीवन एक अंगूठी है,
मैं कहूँ, पसीना ही उसका अनमोल नगीना है।
दिन-रात, वयोगी उर के सतत प्रज्ज्वलन-सी,
धू-धू करके भट्टियाँ प्रचण्ड दहकती हैं।
इस्पात पिघल जाता स्नेहिल अन्तर-सा,
शुभ अगरु-धूप-सी साँसें नित्य महकती हैं।
श्रम अर्थ-व्यवस्था के क्षय से पीड़ित रहता,
श्रम का फल कोई पाए तो कैसे पाए।
पूँजीवादी अन्तर की स्वार्थ-साधना-सी
चिमनियाँ खड़ी रहतीं सुरसा-सा मुँह बाए।
मन की विकृतियों जैसा धुँआ उगलतीं वे,
उनकी कालिख जन-जीवन पर छा जाती है।
जीवन पर छाई यह कालिख तब उड़ती है,
प्रज्ज्वलित क्रांति की जब आँधी आ जाती है।
आँधियाँ अनेकों मैंने ऐसी देखी हैं,
भूकम्प कई भीषण मेरे घर आए हैं।
मानव होकर जो मानव का शोषण करते
अपनी लपटों से उनके मुँह झुलसाए हैं।
संघर्ष उठाए, मेरे उग्र विचारों ने,
तूफान भयंकर इन साँसों ने झेले हैं।
जिन्दगी धरोहर रखी नहीं फूलों के घर,
मैंने काँटों के खेल अनेकों खेले हैं।
मेरी आँखों में घूम रहा सन् सत्तावन,
जब मुक्ति-समर में मेरे शेर दहाड़े थे।
युद्धोन्माद ने भीषण प्रलय मचाया था,
वे झपट पड़े तो शत्रु कलेजे फाड़े थे।
फिर क्रांन्ति-काल के वे दिन जब लपटें नाचीं,
पिस्तौलों ने जब मचल भैरवी गाई थी।
बम के गोलों ने भड़क-भड़क कर ताल दिया,
अंग्रेजों की तब अकल ठिकाने आई थी।
वे सिंह-सूरमा एक-दूसरे से बढ़कर,
बन गया कानपुर उनके लिए अखाड़ा था।
लोहू से उनने रंगा क्रान्ति के झण्डे को,
साम्राज्यवाद की छाती पर ही गाड़ा था।
जब डूब गए कुछ तारे, कुछ टिमटिमा रहे,
आजाद, गगन में धूमकेतु-सा आया था।
साम्राज्यवाद के पैरों की धरती खिसकी,
सत्यानाशी फल उसने उन्हें चखाया था।
जाने कितनी थी आग विचारों में उसके,
संकेतों में ज्वालामुखियों का नर्तन था।
बलिपंथी पागल पर्वानों को साथ लिए,
वह एक नए युग का कर रहा प्रवर्तन था।
रौंदा करता था शत्रु-कलेजे मचल-मचल,
वह क्रुद्ध प्रभंजन जैसी भीषण चाल लिए।
वह खोज रहा था भारत की आजादी को,
अपने प्राणों की जलती हुई मशाल लिए।
-०००-
भाग - 16
अखण्ड भारत
मैं नगर कानपुर, भूल नहीं पाता वह दिन,
जब आसमान से सूरज आग उगलता था।
लगता था, जैसे किरणें गर्म सलाखें हैं,
धरती का चप्पा-चप्पा उनसे जलता था।
लू के प्रवाह का क्रुद्ध प्रवर्तन ऐसा था,
जैसे कि भयंकर आग पिघल कर आई हो।
या प्रलय-सूर्य ने स्वयं आगमन के पहले
आगमन-सूचना की पत्रिका पठाई हो।
लगता था, जैसे, सौ-पचास भट्टियाँ नहीं,
बन गया नगर ही एक बड़ा-सा भट्टा है।
चिमनियों, धुएँ के असित-रंग-आकर्षण से,
आतप सारा का सारा यहाँ इकट्ठा है।
सारा का सारा नगर एक भारी कढ़ाह,
जिसमें पड़कर चेतन-जीवन खलबला रहा।
लू के झोंके कर देते जीवन अस्त-व्यस्त,
जैसे कढ़ाह में कोई कोंचे चला रहा।
ऐसे आलम में लोग प्राण-रक्षा करने,
दुबके बैठे अपने-अपने घर के बिल में।
कुछ कर्मयोग के साधक उस दोपहरी में,
लड़ रहे धूप से, आग लिए अपने दिल में।
आजाद साथ दल के, था वन-वन भटक रहा,
लग गई पुलिस को गंध, नगर वह छान रही।
जितने अनियारी मूँछों वाले हाथ लगे,
वह पकड़-पकड़ कर उन सबको पहचान रही।
तप रही तवा जैसी धरती, पर वीर उधर,
था रौंद रहा वन को, वह दावानल जैसा।
जैसे कोई औघड़ हो, जीत रहा ऋतु को,
या धुनी भटकता हो कोई पागल जैसा।
अपने मित्रों के प्रति उसका उद्बोधन था,
साथियो! आज जीवन की सही समीक्षा है।
यह धूप न केवल अपने लिए चुनौती है,
यौवन के उन्मादों की कठिन परीक्षा है।
तप रहे खून की गर्मी से, क्या धूप उन्हें,
चाँदनी समझ उसको, वे रास रचाते हैं।
जो अपने यौवन की ही आग लिए फिरते,
वे किसी लपट से दामन नहीं बचाते हैं।
जिनके यौवन का खून खौलता नहीं कभी,
वे आग और लपटों की चर्चा करते हैं।
जिनके शोणित में आग प्रवाहित होती है,
ज्वालाओं के तल में वे लोग उतरते हैं।
हम मस्तक अपने रख हथेलियों पर फिरते,
कोई प्रचण्ड आतप क्या हमें डराएगा।
अपने सर से हम कफन बाँध कर ही निकले,
क्यों काल नहीं फिर हमसे मुँह की खाएगा।
हम आज़ादी की देवी को करने प्रसन्न,
अपने प्राणों के पुष्पहार लेकर निकले।
निश्चित है, उसकी भेंट चढ़ेंगे ही हम सब,
हम में से कुछ, कुछ पीछे, या कुछ, कुछ पहले।
इसलिए प्रतिज्ञा करें कि कोई दुर्बलता,
दल के गौरव पर कालिख नहीं लगाएगी।
यदि देशद्रोह की गंध तनिक भी आई, तो,
गोली ही उसको अनुशासन समझाएगी।
जो मानचित्र खींचा है हमने भारत का,
अपने शोणित, का हम सब उसमें रंग भरें।
जीवन में और मरण में एक-दूसरे के-
हम साथ रहेंगे, मिलकर यह संकल्प करें।
लग गई होड़, 'यह लो ! यह लो!` कहकर सबने,
अपने हाथों से अपना-अपना खून दिया।
जो मानचित्र खींचा अखण्ड भारत का था,
उसको रंग कर, जीवन को जोश-जुनून दिया।
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भाग - 17
आगरा
आग का घर
जिसके अन्तर में पौरुष की है आग भरी
मैं उसी आग का हूँ, आगरा कहाता हूँ।
सब जुल्म-जोर के जल जाते हैं घास पात,
जब आँख बदल कर मैं अपनी पर आता हूँ।
मेरी सड़कों, गलियों, या कूचे-कूचे में,
भारत का है गौरव-शाली इतिहास छिपा।
मेरी अलसाई आँखों में पतझार छिपा,
मेरी मदमाई आँखों में मधुमास छिपा।
कह रहा कौन, आड़ा-तिरछा मेरा आँगन,
कुछ लाल-धवल उस आँगन में पाषाण भरे।
सच बात अगर सुनना चाहें, मुझसे सुनिए,
मेरे पत्थर-पत्थर में जीवित प्राण भरे।
भारत की संस्कृति का जय-घोष कर रही जो,
वह यमुना भी मेरे घर होकर बहती है।
मेरे वैभव के जो दिन उसने देखे हैं,
वह उसकी गाथा हर दर्शक से कहती है।
क्या ताजमहल का भी लेखा देना होगा?
आश्चर्य विश्व का, किन्तु गर्व वह अपनों का।
लगता है, जैसे कला देह धर आई है,
या फूल खिला बैठा है सुन्दर सपनों का।
या याद किसी की बर्फ बन गई है जम कर,
या कीर्ति किसी की गई दूध से है धोई।
या श्रम की साँसों की पावनता उग आई,
या गढ़ कर ही रह गई दृष्टि उजली काई।
कोई कुछ भी कहना चाहे कह सकता है,
पर एक बात है, ताज ताज है भारत का।
वह व्यक्ति-स्नेह की यादगार तो है ही, पर
यह भी सच है वह मान आज है भारत का।
यह नहीं कि स्वर की जमीं-लहरियाँ ही केवल,
यह नहीं कि मेरे फूल-फूल ही महके हैं।
लपटों ने भी गौरव की रखवाली की है,
जब कभी आँच आई, अंगारे दहके हैं।
आजादी के संघर्ष-काल के वे दिन, जब,
उठ खड़े हो गए जगह-जगह कुछ दीवाने।
उस महफिले की थी एक शमा भी जली यहाँ,
आए थे जाने कहाँ-कहाँ से परवाने।
सरकार फिरंगी उन्हें क्रांतिकारी कहती,
वह चून बाँध कर उनके पीछे पड़ी हुई।
वे भी तो उसके पीछे पड़े भूत जैसे,
आजादी पर दोनों की गाड़ी अड़ी हुई।
वे कहते, आजादी अधिकार हमारा है,
अधिकार माँग कर नहीं, इसे लड़कर लेंगे।
सरकार खुशी से नहीं दे रही, तो अब हम,
आजादी इसकी छाती पर चढ़ कर लेंगे।
हम नहीं याचनाएँ करने के विश्वासी,
हम मार-मार कर इनके भूत भगाएँगे।
हम गोली का, बमगोलों से उत्तर देंगे,
आहुतियों से लपटों की भूख जगाएँगें।
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भाग -18
चाँदनी और चट्टान-द्वीप
उस दिन जब निकला चाँद, चाँदनी भी निकली,
वह तेज नशे की हलकी हुई खुमारी सी।
रेशमी-धवल साड़ी में धरा सुशोभित थी,
अवगुण्ठित स्नेहिल विनय-शील सुकुमारी-सी।
चाँदनी, कि जैसे कुशल चाँद जादूगर ने,
दर्शक-दल पर अपनी मोहनी बिखेरी हो।
या किरण-जाल फैला धरती को फाँस लिया,
नभ के मचान पर बैठा चाँद अहेरी हो।
चाँदनी, धरा पर दूती बन कर आई-सी,
वह चाँद, प्रतीक्षा-रत जैसे अभिसारी हो।
या जिसका मुँह फक हुआ जमा-पूँजी खोकर,
वह चाँद, कि जैसे हारा हुआ जुआरी हो।
चाँदनी, कि जैसे उजली कीर्ति कलाधर की,
दिशि-विदिशाओं में सुमन-सुरभि-सी फैली थी
वह चाँद, सुकवि जैसे रहस्यवादी कोई,
चाँदनी, कि, जैसे उसकी अपनी शैली थी।
वह चाँद, फुहारों का हो जैसे छतनारा,
धरती जैसे जी-भर मल-मल कर नहा रही।
चाँदनी, कि जैसे स्वच्छ झाग हो साबुन का,
या नभ की ग्वालिन दूध धरा पर बहा रही।
मैं स्नात आगरा रूप-रंग-रस धारा में,
स्वप्निल कल्पना-तरंगों में लहराया-सा।
राका रजनी की रजत-रश्मियों से कर्षित,
था ताज-क्षेत्र में जन-जीवन बौराया सा।
कुछ यहाँ-वहाँ बैठे थे बिखरे-बिखरे से,
गपशप करते मुकुलित सुरभित उद्यानों में।
मखमली गलीचे जैसा हरित दूर्बा-दल,
मृदु सिहरन भरता यौवन के अरमानों में।
थी होड़ लगी, कुछ सुमन उधर, कुछ सुमन इधर,
सौरभ-तंरग थी प्रसरित बहु-धाराओं में।
कुछ भ्रमर उधर बन्दी थे सरसिज-संपुट में,
मन हुए इधर बन्दी, तन की काराओं में।
चाँदनी स्निग्ध-शीतल थी चन्दन जैसी, पर,
बाजार गर्म था विविध भाव-अनुभावों का।
थी कहीं उपालंभित प्रेमी की निष्ठुरता,
हो रहा प्रदर्शन कहीं हृदय के घावों का।
था मान-मनौवल कहीं, कहीं वादों की झड़,
थी कहीं दुहाई दी जाती विश्वासों की।
मीठे सपनों को सरसाती स्वर छेड़ रही,
बाँसुरी कहीं मादक श्वासों-प्रश्वासों की।
लगता, जैसे जीवन केवल वैभव-विलास,
लगता, जैसे दुनिया केवल रस की धारा।
लगता जैसे सौन्दर्य चक्रवर्ती शासक,
लगता था, जैसे कोमल रूप कठिन कारा।
मनुहार-प्यार के इस अगाध सागर में ही,
संकल्प प्रखर भी थी कुछ बड़वानल जैसे।
उठ रहा झाग फुसफुसा धरातल पर केवल,
भूकम्प छिपाए हुए अतल का जल जैसे।
आनन्द महासागर में दो चट्टान-द्वीप,
कर रहे धरातल की गतियों का अनुशीलन।
उनके कठोर संकल्पों में विस्फोट सजग,
वे क्या जाने मन की कलियों का उन्मीलन।
प्रतिमान द्वीप द्वय थे नगराज हिमालय के,
उपलब्धि एक की तन-मन की उँचाई थी।
संगठित, पुष्ट पौरुष की घनीभूत गरिमा,
जो द्वीप दूसरा था, वह उसने पाई थी।
यदि नामकरण अत्यावश्यक हो, तो कह दूँ,
था भगतसिंह, पौरुष पंजाबी पानी का।
आजाद, नाम था फौलादी संकल्पों का,
वह चरम बिन्दु था तपती हुई जवानी का।
ज्योत्सना-सरोवर में वे कमल-पत्र जैसे,
मन तो क्या तन पर भी न बूँद क्षण भर ठहरी।
रस की रुचि ऐसी, जैसे पानी की लकीर,
कर्त्तव्य-सजगता पत्थर की रेखा गहरी।
आजाद फुसफुसाया, ``क्या बुरा जमाना है,
अभिशाप गुलामी का साँसों पर छाया है।
यह यौवन है जो पिघल रहा शीतलता से,
यह जीवन का आनन्द लूटने आया है।
मन में आता है, अगर चले मेरा वश तो,
वैभव-विलास के घर में आग लगा दूँ मैं।
सम्मान बेच, सुख-नींद सो रहा जो समाज,
जी करता, उसकी ठोकर मार जगा दूँ मैं।
प्रतिरोध न करता जो यौवन अन्यायों का,
जिस लाल खून में नहीं आग की गर्मी है।
जिन साँसों में है लपटों जैसी लहक नहीं,
जिन्दगी, जिन्दगी नहीं, बड़ी बेशर्मी है।
सहमति सूचक `हाँ' भगतसिंह के स्वर में थी,
उद्दाम मनोभावों का किया समर्थन था।
उसके चिन्तन को तर्क सदा बनते खराद,
इसलिए विनत हो प्रस्तुत यह संशोधन था।
क्यों आग लगाएँ हम अपने समाज में ही,
हम लोग गुलामी की ही चिता सजाएँगे।
जिसने हमको अपने घर में घर-हीन किया,
उसकी इंर्टों से अब हम ईंट बजाएँगे।
आजादी अपना मूल्य माँगती है हमसे,
हम अपने मीठे सपनों का बलिदान करें।
जिसकी मिट्टी की गंध समाई साँसों में,
जीवन देकर, उस धरती का सम्मान करें।
उल्टी-सीधी, सीधी-उल्टी इसकी गति हैं,
यह व्यक्ति-देश का भाग्य-चक्र ऐसे फिरता।
मर-मिंटे व्यक्ति, तो देश सँवरता है उनका,
यदि व्यक्ति सँवरते, देश बहुत नीचे गिरता।
इसलिए करें संकल्प, नींव के पत्थर बन,
छाती पर आजादी का महल उठायेंगे।
हम नींव खून से जितनी-जितनी सींचेगे,
उस मंजिल पर हम उतने शिखर चढ़ाएंगे।
आजाद तड़प कर बोल उठा, `सुन भगतसिंह!
यह खून देश का है, यह मेरा खून नहीं।
जो मेरे संकल्पों की गति को रोक सके,
इस शासन पर ऐसा कोई कानून नहीं।
मैं प्रलय-मेघ-सा शासन पर मंडराऊँगा,
मैं आजादी का पावन कमल खिलाऊँगा।
प्यासी धरती को लोग पिलाते पानी, मैं-
अपनी धरती को अपना खून पिलाऊँगा।
मैं रक्त तिलक कर, वचन दे रहा हूँ तुझको,
लोहित लहरों में तेरे साथ बहूँगा मैं।
जब खूनी तूफानों में कूद पडेग़ा तू,
उस तैराकी में पीछे नहीं रहूँगा मैं।
-०००-
चन्द्रशेखर आजाद महाकाव्य
-श्रीकृष्ण सरल
भाग- 19
लाहौर
प्यारे सपने
लाहौर, नगर मैं टूटे हुए सितारे-सा,
मैं ऐसा भटका, रहा ठिकाना-ठौर नहीं।
लाहौर, बिंब हूँ मैं भारत के दर्पण का,
मैं बदल गया हूँ फिर षी क्या लाहौर नहीं।
लाहौर जगह वह-मिले जहाँ दो मोड़ मुझे,
मै गलत दिशा में गलती से मुड़ आया हूँ।
लाहौर, पात मैं भारत की ही डाली का,
इस ओर हवा के झोंके से उड़ आया हूँ।
कहते हैं टूटा पात न डाली पर लगता,
क्या इस परवशता का मुझको कम खेद नहीं?
जो चाहो रख दो नाम, नाम में क्या रक्खा,
तुम राम कहो या मैं रहीम, कुछ भेद नहीं।
धरती तो अब भी वही, जहाँ मैं पहले था,
क्या आसमान टुकड़े-टुकडे हो पाया है?
है हवा एक, जो दोनों घर आती जाती,
प्रतिबन्ध किसी ने उस पर कभी लगाया है?
इस बदले हुए जमाने में भी क्या बदला,
दिल वही रहा, केवल विचार ही बदले हैं।
दुलहिन की डोली वही, वही दुलहिन भी है,
वे बदल न पाए, बस कहार ही बदले हैं।
जो पाँख-पखेरू पहले थे, वे अब भी हैं,
गाते तो वे ही गीत आज भी गाते हैं।
यदि बदल गया कुछ, ऐनक ही तो बदला है,
आँखों में अब भी वे ही सपने आते हैं।
वह अंग्रेजों का जुल्म-सितम वरपा करना,
कंधे से कंधा मिला, सभी का भिड़ जाना।
वह बलिदानों की होड़, दौड़ कुर्बानी की,
वह आजादी की जंग अनोखी छिड़ जाना।
वह शान्ति-अहिंसा की भारत-माता की जय,
वह आग क्रान्ति की, इन्कलाब का वह नारा।
लगता था, जैसे ये बादल छंट जाएंगे,
लगता था, अब हो जाएगा वारा-न्यारा।
जो कुछ मैंने वारा वह, व्यर्थ हुआ सारा,
मेरे पाँसे भी उल्टे सारे के सारे।
मैं सोच रहा था अब वारे-न्यारे होंगे,
दो भाई लड़कर किन्तु हुए न्यारे-न्यारे।
वह तीर जहर में बुझा हुआ था दुश्मन का,
कर गया काम, हम तड़पे और छटपटाए।
जब न्याय-तराजू बन्दर के हाथों में थी,
मिलना जाना क्या था, केवल आँसू पाए।
आँसू बोए, तो भेद-भाव की बेल उगी,
जब खिले फूल नफरत के, तो दुश्मनी फली।
वे राम और रहमान साथ चलते थे जो,
अब उन दोनों में आपस में तलवार चली।
जो कुछ मैंने देखा, बयान के बाहर है,
जो हुआ, हो गया वह, उसको हो जाने दो।
मत छेड़ो उन घावों को, छिड़को नमक नहीं,
दो घड़ी चैन पाऊँ, मुझको सो जाने दो।
दो घड़ी नींद गहरी लग गई अगर मेरी,
तो ये विचार फिर मुझको नहीं सताएंगे।
वे अच्छे दिन हौले-हौले फिर उभरेंगे,
आँखों में वे प्यार सपने फिर आएंगे।
फिर रासबिहारी बोस यहाँ पर आएंगे,
कर्तारसिंह को आकर गले लगाएंगे।
कर्तारसिंह ने फंदा चूम लिया यदि तो,
वे भतसिंह को वह मस्ती दे जायेंगे।
पंजाब-केसरी भगतसिंह फिर गरजेगा
हम लालाजी की हत्या का बदला लेंगे।
सुखदेव! राजगुरु! ओ आजाद बली! आओ!
हम हत्यारे को अच्छा एक सबक देंगे।
आजाद पुकारेगा, ओ भैया भगतसिंह !
मत समझ कि तू संकट में वहाँ अकेला है।
जब कभी दोस्त का गिरा पसीना धरती पर,
हँसते-हँसते आजाद जान पर खेला है।
फिर कूद-फाँद आजाद यहाँ आ धमकेगा,
आजादी के दीवाने गले मिलेंगे, फिर।
सान्डर्स, गोलियों से फिर भूना जाएगा,
उनकी पिस्तौलों से गुल कई खिलेंगे फिर।
जब चनन सिंह झपटेगा भगतसिंह पर, तो
आजाद गर्जना कर, ललकारेगा उसको।
कर सुनी-अनसुनी चननसिंह यदि फिर लपका
आजाद मौ के घाट उतारेगा उसको।
फिर लिखा मिलेगा घर-घर गली-गली में यह
लालाजी की हत्या का बदला चुका दिया।
जो सर घमंड से अकड़ कर चलता था,
थप्पड़ जड़कर उस सर को हमने झुका दिया।
छेड़ेगा मुझको भगतसिंह अफसर बनकर,
आजाद कीर्तन-मंडल एक बनाएगा।
मैं झूम उठूँगा उसकी मस्ती देख-देख,
मुझको सलाम करता-करता वह जाएगा।
मैं रुखसत दूँगा उसे खुदा हाफिज कह कर,
उसकी खुशहाली की मैं दुआ मनाऊँगा।
अपनी गर्दन को झुका देख लेने उसको,
मैं दिल पर ही उसकी तस्वीर बनाऊँगा।
-०००-
भाग- 20
मीठा-मीठा दर्द
तुम पूछ रहे हो मुझसे वे बीती बातें,
शायद तुम मेरी दुखती नस पहचान गए।
मैं करता हूँ महसूस दर्द मीठा-मीठा,
अजनबी मुसाफिर! शायद तुम यह जान गए।
तो सुनो, एक-दो बातें और बताता हूँ,
आजाद, नहीं उसमें पंजाबी पानी था।
पर जो पानी था, वह तेजाबी पानी था,
क्या कहें खून की, वह सचमुच लासानी था।
क्या सूझ-बूझ थी उसकी कार्य-व्यवस्था में,
किसकी मजाल, जो एक नुक्स भी पा जाए।
योजना, देख लेता था वह नस-नस उसकी,
नामुमकिन क्या, जब वह अपनी पर आ जाए।
हौसला, भला उसका मुकाबिला कहाँ मिला,
जो मिले नहीं ढूँढ़े, वह विकट दिलेरी थी।
जो आँख उठा कर देख सके वह आँख कहाँ?
उसके आगे हिम्मत क्या तेरी-मेरी थी।
संकल्प, बपौती में जैसे उसने पाए,
आदर्श, स्वयं जैसे उसने अपनाए थे।
निस्वार्थ त्याग, जैसे यह उसकी आदत थी,
सच्चे नेता के गुण उसने सब पाए थे।
उस दिन, जब छेड़ा बहुत साथियों ने उसको,
गुस्से में आकर फेंक दिया अपना भोजन।
साथी बोले-अफसोस हमे, पर पंडित जी!
पैसे लेकर, यह करो दुबारा आयोजन।
आजाद कड़क कर बोला, पैसे कहाँ रखे?
ये पैसे यों ही मुफ्त नहीं आ जाते हैं।
जो कोई देता, वह अपने दल को देता,
हम भी उसको पूरा विश्वास दिलाते हैं ।
कर्त्तव्य-भार हम पर भी यह आ जाता है,
रक्खें हिसाब हम उनकी पाई-पाई का।
खाने-पीने में पैसे नहीं उड़ाएँ वे,
सम्मान करें हम दल की नेक कमाई का।
अब निराहार ही आज मुझे रहना होगा,
दल की निधि से, मैं पैसा एक नहीं लूँगा।
मेरा ही दिल, यदि मुझसे पूछेगा हिसाब,
क्या समझाऊँगा, उसको क्या उत्तर दूँगा।
हाँ अगर चाहते तुम, मैं भूखा नहीं रहूँ,
जो फेंक दिए नाली में चने, उठा लाओ।
पानी से धोकर मैं उसको ही खाऊँगा,
अन्तिम निर्णय है, मुझे नहीं तुम फुसलाओ।
झख मार, उठाए गए चने नाली में से,
वे ही उसने खाए, पानी से धो-धो कर।
अतिरिक्त एक पाई भी उसने छुई नहीं,
की नहीं खयानत उसने खुद नेता होकर।
यह देख लिया तुमने, नेता क्या होता है,
कैसे संयम से वह ईमान बचाता है।
वह अपनी लम्बी जीभ नहीं फैलाता है,
लेकर डकार, वह पैसे नहीं पचाता है।
जो कुछ मिल जाए, हड़प नही लेता है वह,
झाँसे देकर गुलछर्रे नहीं उड़ाता है।
बेरहम नहीं होता वह, माले मुफ्त देख,
काले धन पर वह लार नहीं टपकाता है।
पर जाने भी दो, एक नहीं सौ बातें है,
क्या-क्या बतलाऊँ, कैसे-कैसे समझाऊँ।
हाँ, बहक गया मैं शायद बातों-बातों में,
इसलिए लौट फिर उस किस्से पर ही आऊँ।
आजाद, बात का धनी वचन का पक्का था,
वह अगर ठान ले, टस-से-मस फिर क्या होना।
आ पडे मुसीबत भारी से भी भारी, पर
कुछ नहीं शिकायत-शिकवे, या रोना-धोना।
दुर्भाग्य देखिए, भगतसिंह को जेल मिली,
भगवतीचरण, बम फट जाने से नहीं रहे।
शासन ने पकडे बम के कई कारखाने,
इस तरह अनेकों उस दल ने आघात सहे।
आजाद, किन्तु विचलित रत्ती भर नहीं हुआ,
फिर लगा संगठन में वह पूरी ताकत से।
शासन से समझौता करने वह झुका नहीं,
वह बाज नहीं आया था कभी बगावत से।
था कौल यही, दम में दम रहते जूझूँगा,
गिन-गिन कर मैं शासन के दाँत उखाड़ूँगा।
पिंजड़ा, वह मुझको पाने मुँह धोकर रक्खे,
आजाद रहा, रहकर आजाद दहाड़ूँगा।
-०००-
भाग- 21
दिल्ली
इतिहास की करवटें
मैं दिल्ली हूँ, युग-युग से रही राजधानी,
भारत के गौरव की प्रख्यात धुरी हूँ मैं।
जो मेरे हैं, मैं उन्हें प्यार की गल-बाँही,
जो शत्रु, कलेजे को विष-बुझी छुरी हूँ मैं।
मेरी नजरों में इतिहासों के प्रलय-सृजन,
हर नजर, खुमारी से बोझिल है बाकी है।
जब ऐसी-वैसी नजर किसी ने फेंकी तो,
उसकी छाती मैंने कीलों से टाँकी है।
मैंने झेली है कड़ी-कड़कती धूप कभी,
तो कभी दूधिया मैं चाँदनी नहाई हूँ।
वैभव-विलास की चकाचौंध पर रीझी हूँ,
पर नहीं कभी उसमें भटकी-भरमाई हूँ।
मैं नहीं किसी की शोख नजर जैसी चंचल,
जो प्यार छिपा कर रखता, मैं उस दिल जैसी।
मैं नहीं किसी चौराहे जैसी भीड़-भाड़,
जो जमे कायदे से, मैं उस महफिल जैसी।
मेरे गौरव की बात पूछते मुझसे ही,
मदमाये फूलों और बहारों से पूछो।
मैंने जीवन में कैसे-कैसे दिन देखे,
सूरज से पूछो चाँद-सितारों से पूछो।
हर कंकड़ ही कुछ लिए कहानी पड़ा हुआ,
कुछ यश गाथा लेकर है हर मीनार खड़ी।
तिलमिला गई, पर मैंने होश नहीं खोया,
जब कभी मुसीबत की हैं मुझ पर मार पड़ी।
आ पड़ी मुसीबत ऐसी ही मुझ पर तब थी,
जब धोखे से लद गया फिरंगी शासन था।
मैं हुंकारी, फुंकारी, झटके दिए कई,
बन गया घोर विद्रोही मेरा जीवन था।
सन सत्तावन में मेरा जौहर जागा, तो,
मेरी लपटों ने खूनी रास रचाया था।
अपने बेटों की आहुतियाँ मैंने दी थीं,
पर भारत के गौरव को सदा बचाया था।
वह जफर, चार बेटों की बलि दी थी उसने,
आजादी के हित उनने शीष कटाए थे।
वे कटे हुए सर रखे बाप के हाथों में,
बर्बर अँग्रेजों ने ये रंग दिखाये थे।
साम्राज्यवाद की खूनी प्यास बढ़ी इतनी,
बहशी हडसन ने सचमुच उनका खून पिया।
मैंने अपनी आँखों से यह सब कुछ देखा,
मैं चीखी-चिल्लाई, पर किसने ध्यान दिया।
कहते, आजादी बिना बहाए खून मिली,
मैंने ऐसी-ऐसी कीमतें चुकाई हैं।
मेरे बेटे फाँसी के फन्दों पर झूले,
तब ये सुहावनी घड़ियाँ घर में आई हैं।
तुम पूछ रहे कुर्बानी मेरे बेटों की,
मेरी जबान पथराई, क्या कह पाऊँगी।
बैठे, यह चित्रावली दे रही मैं तुमको,
पन्ने पलटो, इसकी झाँकियाँ दिखाऊँगी।
-०००-
भाग- 22
चित्र-विचित्र
यह चित्र, तुम्हारी आँखों के सम्मुख है जो,
चल-समारोह यह जाता दिखलाई देता।
लगता, अँग्रेजी शासन का वैभव-विलास,
इस तरह अकड़ कर ही यह अँगडाई़ लेता।
यह शान-वान, यह ठाठ-बाट, गाजे-बाजे,
दे रहे साथ सजधज कर, राजे-रजवाडे।
यह कदम-कदम आगे बढ़ती पैदल सेना,
ये घुड़सवार, हाथों में ही झण्डे गाड़े।
यह घूम-झूम चलता पर्वत जैसा हाथी,
यह सजी लाट साहब की आज सवारी है।
भारतवासी चूँ करें, नहीं वह धाक जमे,
इसलिए आज की यह सारी तैयारी है।
यह चित्र इसी क्रम का है, यह भगदड़ कैसी?
कह रहा धुँआ, यह बम का हुआ धड़ाका है।
बच गए लाट साहब हैं बिलकुल बाल-बाल,
उनके यश पर इस तरह पड़ा यह डाका है।
मैंने लोगों से चर्चा की, तो बतलाया,
यह काम किसी का नहीं, क्रांतिकारी दल का।
बम-काण्ड योजना थी यह रासू दादा की,
लग गया पता अब शासन को उनके बल का।
लो पलट दिया यह पृष्ठ, दूसरा चित्र दिखा,
हो रही सभा यह गुप्त क्रांतिकारी दल की।
ये सभी क्रांति के माने हुए सितारे हैं,
सब आग लिए अपने-अपने अन्तस्तल की।
इनकी बातें मेरे कानों में भी आईं,
ये दिखे मुझे सब के सब प्राणों के दानी।
आजाद उपस्थित हुआ नहीं, पर निर्विरोध,
वह चुना गया था इस सेना का सेनानी।
उसके प्रति यह निष्ठा, ऐसा विश्वास अडिग,
यह मुझे हर्ष की और गर्व की बात बनी।
उस सेनानी ने दल में नई जान डाली,
फिर जोर-शोर से अँग्रजों से जंग ठनी।
यह नया पृष्ठ, यह नया चित्र, देखें इसको,
आजाद-भगत, ये गुप्त मन्त्रणा में रत हैं।
इतने स्नेहिल, भाई-भाई से अधिक प्रेम,
जो असंभाव्य, ये उसको करने उद्यत हैं।
इनकी बातों का यह रहस्य था मिला मुझे,
इनको असेम्बली में करनी थी बमबारी।
शासन के बहरे कान खोलने थे उनको,
आजाद, व्यवस्था उसने ही की थी सारी।
वह जाने कितनी बार सभा में हो आया,
की जाँच, स्वयं उसने सब कुछ देखा-भाला।
जब हुआ उसे सन्तोष, योजना सक्रिय थी,
केवल न सभा, उसने साम्राज्य हिला डाला।
जैसे ये देखे, वैसे चित्र अनेकों हैं,
इनकी मस्ती के कई रूप हैं, रंग कई।
आजाद, झलक मिलती है उसकी कई जगह,
चित्रित उससे जीवन के यहाँ प्रसंग कई।
निर्द्वंन्द्व घूमता था वह मुक्त-पवन जैसा,
वह मन की गति जैसा ही था आता-जाता।
व्यक्तित्व शीत-ज्वर जैसा ही था कुछ उसका,
कँप-कँपी छूटती, शासन उससे थर्राता।
जिसको पढ़-पढ़ कर लोग वीर बनते जाते,
आजाद, वीरता की वह जीवित परिभाषा।
भारत-माता का, वह साकार सुखद सपना,
उसके अन्तर की वह सबसे उज्ज्वल आशा।
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