चन्द्रशेखर आजाद-23, 24, 25, 26
महाकाव्य
चन्द्रशेखर आजाद
-रचनाकार
श्रीकृष्ण सरल
भाग- 23
प्रयाग
बोलते-फूल
मैं हूँ प्रयाग, जीवन पुण्यों का पुष्पित तरु,
मैं कठिन तपस्या का अभिलषित प्राप्त वर हूँ।
मैं ज्ञान-कर्म-इच्छा का शुभ्र मिलन-मन्दिर,
भारत की संस्कृतियों की रखे धरोहर हूँ।
माँ वाणी की पूजा का मैं पावन प्रसाद,
मैं अगरु, धूप-चन्दन का धूम्र सुगंधित हूँ।
मैं सत्यं-शिवम्-सुन्दरम् का साकार रूप,
मैं तीर्थराज के गौरव से अभिवन्दित हूँ।
साहित्य-कला-संस्कृति की पुण्य-त्रिवेणी मैं,
मैं जीवन के पावन प्रवाह का शुभ-संगम।
मैं वेद-पुराणों-इतिहासों का मुखरित स्वर,
मैंने उनके उपदेश किए हैं हृदयंगम।
मैं हूँ यथार्थ-आदर्श और सिद्धान्त रूप,
मैं गंगा-यमुना-सरस्वती का हूँ प्रवाह,
सागर की गहराई तो नापी जा सकती,
मेरे अन्तर की गहराई युग-युग अथाह।
यह नहीं कि केवल गंगा, युमना, सरस्वती,
मेरे आँगन में हिल-मिल कर लहराती हैं।
जीवन की जाने कितनी विषम विविधतायें,
सब मेरे घर आपस में मिलने आती हैं।
मेरी धारा का पुण्य-परस इतना पावन,
छू देते ही अस्थियाँ फूल बन जाती हैं।
प्रतिकूल हवाएँ आकर यहाँ गले मिलतीं,
बह पाने के भावों में वे सन जाती हैं।
मैं कभी रात्रि के सन्नाटे में सुनता हूँ,
तल में, वे सोए हुए फूल बतराते है,
वे कौन, कहाँ से आए, क्या-क्या करते थे,
ये सब बातें, वे सुनते और सुनाते हैं।
कोई कहता, थी लाख-करोड़ों की सम्पत्ति,
जब आया मैं, तो सभी छोड़कर आया हूँ।
कोई कहता दुनिया बिलकुल निस्सार दिखी,
मैं उस जग से सम्बन्ध तोड़कर आया हूँ।
किसनू कहता, मैं बाग-बगीचे खेत-खले,
अपने बेटे के नाम लिखा कर आया हूँ।
साहू कहता, जो कुछ था-सब धरती में था,
क्या छिपा कहाँ, मैं सभी दिखाकर आया हूँ।
यह धनीराम का कथन कि घर के आँगन में,
रुपयों के बादल आकर रोज बरसते थे।
विश्वास छोड़ दीनू कहता, मेरे बच्चे,
भूखे रहकर टुकड़ों के लिए तरसते थे।
पुनिया कहती, मैं आई तो आते-आते,
मैंने अपनी मुनिया का ब्याह रचाया था।
कर दिए हाथ पीले, मैं रिण से उरिण हुई,
बड़भागिन ने इन्दर जैसा वर पाया था।
पारो कहती, वे मेरे सिरहाने ही थे,
हौले से मेरा माथा तनिक हिलाया था।
पा सुखद परस, मैंने आँखें खोलीं, उनने,
रोते-रोते गंगाजल मुझे पिलाया था।
टूटे से स्वर में मैं इतना कह सकी, नाथ!
मैं बड़भागिन हूँ, बनी सुहागिन जाती हूँ।
मेरे बच्चों को सदा सुखी रखना प्रियतम!
तुम सुखी रहो, मैं भी यह दुआ मनाती हूँ।
सुखिया कहती, मैं जीवन भर की दुखियारी,
सुख मिला कभी, वह एक नाम का ही सुख था।
हाँ एक और सुख था, वह सचमुच ही सुख था,
वह मेरे वीर-बहादुर बेटे का मुख था।
जब चलता वह, तो जैसे धरती हिलती थी,
मेरे बेटे की गज भर चौड़ी छाती थी।
सम्पदा सिमट मेरे घर आँगन में आती,
मैं उसे देख लेती, निहाल हो जाती थी।
ज्ञानी जी, अपनी ज्ञान भरी बातें करते,
दुनिया क्या है छल है, प्रपंच है, माया है।
हम मुट्ठी बाँधे गए और खोले आए,
फूटी कौड़ी भी कोई साथ न लाया है।
जग में धन-दौलत सुत-दारा हैं सभी व्यर्थ,
मन को न शांति क्षण भर इनसे मिल पाई है।
है धर्म और धरती की सेवा कर्म जिन्हें,
वह सेवा उनकी सबसे बड़ी कमाई है।
इस भाँति स्तब्ध-सन्नाटे में, मैं उन सबकी,
सुनता रहता हूँ सुख-दुख की अगणित बातें।
कुछ पता नहीं चलता, कितना क्या समय गया,
इस तरह बीतती जाती है अगणित रातें।
हाँ, इन बातों से परे और भी बातें हैं,
जिनको मैं अपनी आँखों-देखी कह सकता।
मैं भूल नहीं पाता कुछ मस्तानी छवियाँ,
सुधियों में उनको देखे बिना न रह सकता।
साहित्य-कला-विज्ञान आदि के वैसे तो,
उद्भट ज्ञाता, विद्वान धुरन्दर रहे कई।
कुछ राजनीति के कुशल खिलाड़ी भी खेले,
कल्पना-तरंगों में भी डूबे-बहे कई।
पर जिसने अपनी छाप बहुत गहरी छोड़ी,
वह एक युवक, जैसे जलता अंगारा था।
छबि कभी-कभी वह मुझे देखने को मिलती,
मुझको उसका व्यक्तित्व बहुत ही प्यारा था।
आजाद नाम से वह सब में जाना जाता,
अँग्रेजों से तकरार वीर ने ठानी थी।
भारत-माता के बन्धन देख न पाता वह,
इसलिए भभक उट्ठी वह नई जवानी थी।
उसने अपने जैसे ही दीवानों का दल,
तैयार कर लिया था मरने मिट जाने को।
अपना जीवन रख दिया मौत के घर गिरवी,
भिड़ गया देश अपना आजाद कराने को।
वैसे उपाधियों के चश्मे से देखें तो,
व्यक्तित्व बहुत ही धुँधला उसका दिखता था।
व्यक्तित्व वीरता के चश्मे से पढ़ें अगर,
हम देखेंगे, वह रक्त-लेख ही लिखता था।
उल्टे-सीधे जो अक्षर उसने सीखे थे,
वे देश-भक्ति के गौरव-ग्रन्थ बने सारे।
जो दुर्बलता का हृदय वेध रख देते हैं,
उस भाषा के सब अक्षर ऐसे अनियारे।
उस अमर-वीर की आत्माहुति का स्वर्ण-लेख,
लिखने के पहले धैर्य जुटाना ही होगा।
अपनी साँसों पर लदा बोझ हल्का करने,
आँसू का अपना कोश लुटाना ही होगा।
--०००--
भाग-24
आत्म-बलिदान
उस दिन उपवन में एक वृक्ष की डाली पर,
शुक और सारिका बैठे गपशप करते थे।
चर्चित होती थी आसमान की ऊँचाई,
धरती की बातों पर वे कभी उतरते थे।
शुक बोला, मेरी जैसी चोंच कहीं देखी?
इतनी सुन्दर, कवि-जन देते हैं उपमाएँ।
सारिका छेड़ बैठी, कवियों की कौन बात-
चाहें तिनके को तीर सरीखा बतलाएँ।
केवल सुन्दर मुख होने से क्या होता है,
हों कर्म हमारे सुन्दर, तब सुन्दरता है।
यदि नहीं आत्मा में उतनी ही सुन्दरता,
तो तेज धूप-सा रूप सदैव अखरता है।
शुक बोला, रूपसि जली-भुनी क्यों बैठी हो?
कवि की वाणी से सुरभित सुमन निकलते हैं।
सारिका तुनक बोली, कवियों की भली चली-
लग जाय रूप की आँच, तुरन्त पिघलते हैं।
अपमान जाति का हुआ देख, शुक खिसियाया,
बोला, छोड़ो ये बातें, करें ज्ञान-चर्चा।
थोड़ा मुस्का कर चुटकी भरी सारिका ने,
क्यों लगी सूझने अब तुमको पूजा-अर्चा ?
शुक और सारिका की यह चहक-चुहुलबाजी,
ला नहीं सकी कोई आकर्षक रंग नया।
दो युवक वृक्ष के नीचे आकर बैठ गए,
हो गया उपस्थित बिल्कुल एक प्रसंग नया।
सारिका सहम संकेतों के स्वर में बोली,
उड़ चलें कहीं हम गपशप वहाँ लड़ाएँगे।
शुक ने संकेत किया, बैठो क्यों डरती हो?
वे हमें पकड़ कर खा थोड़े ही जाएँगे।
सारिका तनिक झुँझलाई, धीरे से बोली-
मेरी मानो, यह डाल छोड़कर उड़ जाएँ।
कुछ नहीं ठिकाना इन मर्दों की चालों का,
क्या पता, फाँस हमको पिंजड़े में लटकाएँ।
इस मीठी चुटकी का रस लेकर शुक बोला,
मर्दों पर क्यों तुम गुस्सा आज उतार रहीं?
मिल गया कौन-सा गुरु, जिसने शिक्षा दी है,
बढ़-बढ़ कर आज मनोविज्ञान बखार रहीं।
सारिका डूबते-से स्वर में शुक से बोली-
उड़ चलें कहीं हम, मेरा मन चिन्तातुर है।
कुछ अशुभ बात होती दिखलाई देती है,
कुछ आशंका से धड़क रहा मेरा उर है।
शुक बोला, नारी हो तुम, यों ही डरती हो,
शुभ और अशुभ की चिन्ता तुम्हें सताती है।
आ जाय छींक तो शकुन-अपशकुन हो जाता,
तिल भर चिन्ता को नारी ताड़ बताती है।
कह उठी सारिका, प्राप्त मुझे वरदान एक,
क्या आगम है, यह भान मुझे हो जाता है।
यदि मँडराती हो मौत किसी के सर पर तो,
उसका यथार्थ अनुमान मुझे हो जाता है।
इन दो में से यह एक गठीला नौ-जवान,
पड़ रही मौत की इसके सर पर छाया है।
मैं सोच रही, इसका भवितव्य टले कैसे,
इस अशुभ अनागत ने ही मुझे सताया है।
शुक बोल उठा, यह भेद आज मैं समझा हूँ,
क्यों शंका-आशंका से नारी मन डरता।
अपनी चिन्ता से अधिक उसे अपनों की है,
जग-जाहिर है नारी की पर-दुख-कातरता।
भवितव्य उसे तुम साफ-साफ ही बतला दो,
कह दो उससे, उठकर अन्यत्र चला जाए।
जो व्यक्ति सगा बनता, वह कभी दगा करता,
कह दो, वह अपनों द्वारा नहीं छला जाए।
कोई सचेत कर सके उसे, इसके पहले-
प्रारम्भ हुआ युवकों में बातों का क्रम था।
यद्यपि चर्चा का विषय गूढ़ ही दिखता था,
बातों में दिखता नहीं कहीं भी विभ्रम था।
''सुखदेव राज! यह देश किधर जा रहा आज,
इसकी गतिविधि कुछ नहीं समझ में आती है।
हम मरें-मिटें, खप जायँ देश-हित-चिन्तन में,
पर जनता तो जी भर आनन्द मनाती है।
उसका मत है, इसका ठेका कुछ लोगों पर,
इन कामों में क्यों अपनी जान फँसाएँ हम ?
जीवन पाया है, खाएँ-पिएँ-करें मस्ती,
यौवन पाया है, झूमें-नाचें-गाएँ हम।
ये युवक कि जो भारत के भाग्य-विधाता है,
ये चकाचौंध की धाराओं में बहते हैं।
लेकर यौवन की आग माँगते ये पानी,
ये जोर जुल्म सब शीश झुकाए सहते हैं।``
सुखदेवराज बोला, "भैया आजाद! सुनो,
हम इनकी गति को मोड़ें तो कैसे मोड़ें।
इनसे कुछ आशा करना, बड़ी दुराशा है,
इसलिए उचित है, हम इनका पीछा छोड़ें।"
"मैं इससे सहमत नहीं, राज! जो तुम कहते,
हम नई आग इन युवकों में भड़काएँगे।
ये उठें, प्रलय के ताण्डव का उद्घोष करें,
ये उठें, भाग्य इस धरती का चमाकाएँगे।
यदि किसी देश की दौलत का अनुमान करें,
संकल्पवान यौवन केवल उसका धन है।
हैं युवक, उठाते राष्ट्र-भार जो कंधों पर,
युवकों से मिलता सदा राष्ट्र को जीवन है।
यदि युवक हुए पथ-भ्रष्ट पतन की क्या सीमा,
ये डूब गए, तो देश रसातल जाता है।
ये उछले, इनके बल पर देश उछलता है,
धरती पर जैसे स्वर्ग उतर कर आता है।
इसलिए करेंगे हम सचेत इस पीढ़ी को,
हम युवकों को करना बलिदान सिखाएँगे।
ये सोए तो दुर्भाग्य हमारा जागेगा,
हम छिड़क खून के छींटे इन्हें जगाएँगे।
इस ओर खून की बात न हो पाई पूरी,
उस ओर खून के बादल सचमुच घिर आए।
सुखदेवराज कब खिसका, पता न चल पाया,
आजाद अकेले पर वे बादल अर्राए।
'तुम कौन?` कड़क कर पूछा पुलिस अधीक्षक ने,
जब सुनी नॉट बाबर के मुख से यह बोली-
आजाद, भला यह सुनने का कब आदी था,
उस बोली पर वह दाग उठा सीधी गोली।
वह गोली उसकी, शत्रु भुजा को ले बैठी,
ऐसा अचूक उसका वह सधा निशाना था।
यह लगा नॉट बाबर को कहाँ उलझ बैठे,
आ गया काल ही सम्मुख, उसने जाना था।
दूसरी ओर विश्वेश्वर लिए मोर्चा था,
कुछ उझक, वीर पर उसने भी गोली छोड़ी।
आजाद, लगाया उसने नहले पर दहला,
अपनी गोली से उसकी भी हड्डी तोड़ी।
कर दिया कचूमर जबड़े का उस गोली ने,
विश्वेश्वर पीछे हट झाड़ी में दुबक गया।
इस ओर डटा आजाद अकेला एक वीर,
उस ओर सैन्य-दल दुश्मन का आ गया नया।
वह गरज-गरज कहता गोरी सेना लाओ,
क्यों मेरे सम्मुख लाए तुम हिन्दुस्तानी ?
देखो, नस-नस में गर्म खौलता खून भरा,
तुम समझ रहे शायद इनमें होगा पानी।
इस भाँति गर्जना कर वह छोड़ रहा गोली,
पिस्तौल, आग की बौछारें थी बरसाती।
जिस ओर छूटती गोली, सन्नाटा छाता,
जिस ओर हाथ उठता, काई-सी फट जाती।
दुर्भाग्य, एक ही तीर बच रहा तर्कश में,
उस काल-मुखी में बची एक अन्तिम गोली।
पिस्तौल लगा माथे से घोड़ा दबा दिया,
वह खेल गया अपने से ही खूनी होली।
बन पड़ी सैन्य-दल की, छोड़ीं गोलियाँ कई,
देखी न पीठ, उनने छाती को भून दिया।
जब-जब बन्दूकों ने छाती को गोली दी,
तब-तब छाती ने क्रुद्ध उबलता खून दिया।
जो खटक रहे अब तक अभाव थे जीवन के,
हो गई पूर्ति उनकी, ऐसी घड़ियाँ आईं।
मुख रहा तरसता गोली खाने बचपन में,
गोलियाँ कई यौवन की छाती ने खाइंर्।
भारत माता का लाल विदा लेकर उससे,
जा मिला शहीदों की मस्तानी टोली में।
जिसकी बोली लोगों को नवजीवन देती,
थी छिपी मौत उसकी हर क्रोधित गोली में।
पुँछ गया देश के माथे का वह रक्त-तिलक,
निर्धनता की कुटिया ने जिसे लगाया था।
हो गया शान्त घन-गर्जन जैसा स्वर, जिसने,
भारत के गौरव को झकझोर जगाया था।
वह लाल विदा हो गया बावली उस माँ का,
साँसों के झूले पर जो उसे झुलाती थी।
रखती जिसको पलकों की शीतल छाया में,
थपकी दे-दे, छाती पर जिसे सुलाती थी।
रह गई बिलखती-रोती वह दुखियारी माँ,
वह उसकी गोदी सूनी करके चला गया।
अपने हाथों से अपना जीवन-दीप बुझा,
जन-जाग्रति की बुझती मशाल वह जला गया।
सो गया मौत की गोदी में वह प्रलय-वीर,
वह मौत नहीं, वह तो जीवन का अलंकरण।
चलता था जीवन रखे हथेली पर जैसे,
कर लिया मौत का भी वैसे ही स्वयं वरण।
जो माँगा था वरदान मौत का, भर पाया,
वह मौत नहीं, शाश्वत जीवन ही उसे मिला।
अपनी धरती को खून पिला कर ही माना,
था रक्त-सरोवर में गौरव का कमल खिला।
जिसको कोई कायरता लाँघ नहीं पाए-
वह मौत, खून की ऐसी अमिट रेख-सी है।
हम जिसे मौत कहते, वह उसकी मौत नहीं,
सदियों की छाती पर वह शिला-लेख सी है।
कह रही मौत वह, चीख-चीख कर यह हमसे,
हम जिएँ देश-हित, और देश के लिए मरें।
भारत-माता जब हमसे यह जीवन माँगे,
हँसते-हँसते यह जीवन अर्पित उसे करें।
प्रेरणा शहीदों से हम अगर नहीं लेंगे,
आजादी ढलती हुई साँझ हो जाएगी।
यदि वीरों की पूजा हम नहीं करेंगे तो
यह सच मानो, वीरता बाँझ हो जाएगी।
--०००--
भाग-25
पथिक
प्रतिबोध
मैं आजादी के परवानों का दीवाना,
मैं आजादी की डगर-डगर में घूमा हूँ।
आजाद चन्द्रशेखर की है जो याद लिए,
उस ग्राम-ग्राम में, नगर-नगर में घूमा हूँ।
कंकड़-पत्थर, गलियों-चौराहों को मैंने,
उस महाबली की याद सँजोते देखा है।
जिनसे उसके जीवन की गाथा जुड़ी हुई,
उन वृक्षों को भी मैंने रोते देखा है।
वह कुटिया, जिसमें उसने प्रथम साँस ली थी,
कहती, मुझको बेटे की आहट आती है।
वे चट्टानें, जिन पर वह खेला-कूदा था,
उन चट्टानों की भी छाती फट जाती है।
मेरे पैरों से लिपट धूल ने पूछा था
जो मुझमें खेला, वह मेरा फौलाद कहाँ?
हर मेंढ़, डगर, पगडण्डी ने भी प्रश्न किया,
आजाद कहाँ? आजाद कहाँ? आजाद कहाँ?
आजाद कहाँ, मैं इसका क्या उत्तर देता,
में उनको रोते और बिलखते छोड़ चला।
मैं घबराया, मेरा ही हृदय न फट जाए,
उस ग्राम-धरा से मैं अपना मुख मोड़ चला।
ओोरछा तीर्थ बन गया देश-भक्तों का जो,
जा पहुँचा मैं भी वहाँ सांत्वना पाने को।
क्या पता कि लेने के देने पड़ जायेंगे,
मैं धैर्य कहाँ से लाऊँ, हाल सुनाने को।
मेरे कन्धों से लग सातार बहुत रोई,
आजाद कहाँ भैया? क्या सन्देशा लाए?
सुध-बुध तो खोता नहीं भावरा याद किए,
बतलाओ, तुम तो अभी वहीं से ही आए।
``आजाद कहाँ? आजाद कहाँ?'' रटते-रटते,
मैंने देखा सातार सूखती जाती थी।
पानी होकर, वह दिल पत्थर कैसे करती,
इसलिए पत्थरों से वह सर टकराती थी।
उस कुटिया में जिसमें योगी आजाद रहा,
उस नर नाहर की वीर-प्रसू माँ आई थी।
उसका क्रन्दन सुन पत्थर पिघल हुए पानी,
फट गए हृदय, उसने पछाड़ जब खाई थी।
दीवारों से सर फोड़-फोड़ उसने पूछा-
``क्यों खड़ी मौन? बतलाओ मेरा लाल कहाँ?
साम्राज्यवाद की पर्वत जैसी छाती भी,
धक-धक करने लगती थी, वह भूचाल कहाँ?
ओ सरिता की वाचाल लहरियों! बोलो तो,
मेरी आशाओं का मृग-छौना कहाँ गया?
माँ होकर भी मैं स्वयं खेलती थी जिससे,
मेरा चन्दा, वह बाल-खिलौना कहाँ गया?
अर्जुन वृक्षों! तुम रहे खड़े के खडे यहाँ,
मेरी आँखों की ज्योति यहाँ से चली गई।
मेरी गुदड़ी में एक लाल ही शेष बचा,
कैसी अभागिनी, मैं उससे भी छली गई।
मेरी छाती से लग कर जिसने दूध पिया,
उस छाती से बोलो अब किसे लगाऊँ मैं?
किसका माथा चूमूँ राजा-बेटा कहकर?
अब कृष्ण-कन्हैया कहकर किसे जगाऊँ मैं?''
जिस तरह किया माँ ने विलाप, उसकी गाथा,
हर पत्ती ने रो-रोकर मुझे बताई थी।
मैं खड़ा रह सका नहीं, वहाँ से खिसक गया,
मुझको प्रयाग में ही अपना सुधि आई थी।
वह उपवन भी मैंने जाकर देखा, जिसमें,
आ गई मौत को भी उसने ललकारा था।
जो वीर प्रसूता माँ का दूध पिया उसने,
वह दूध, खून का बन बैठा फव्वारा था।
उस उपवन का हर वृक्ष तड़पता दिखा मुझे,
यह साख-साख ने फूट-फूट कर बतलाया।
आजाद नाम, जो बना वीरता का प्रतीक,
वह सुभट-सूरमा लड़कर यहीं काम आया।
आ-आकर मुझमे कई हवाएँ कह जातीं,
उस बलिदानी को लोग भूलते जाते हैं।
जिन आँखों ने उसका लोहू बहते देखा,
उन आँखों में पद-लोभ फूलते जाते हैं।
कह देना उनसे एक बात यह समझा कर,
जो याद शहीदों की इस तरह भुलाते हैं,
दुश्मन उनकी आजादी को तकते रहते,
जब दाँव लगा, तो वे उसको खा जाते हैं।
कह देना, आजादी जीवित रखनी है तो,
उन सब को पूजें, जिनने खून बहाया है।
यह बिना खून की बूँद बहाए नहीं मिली,
लोहू का भागीरथ यह गंगा लाया है।
यह नहीं, याद भर ही उनकी हो अलम् हमें,
अवसर आए प्राणों के पुष्प चढ़ाएँ हम।
अब आजादी की बलिवेदी माँगे हविष्य,
अपने हाथों से अपने शीष चढाएँ हम।
कर्त्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे,
हर एक साँस को एक सबक यह याद रहे
अपनी हस्ती क्या, रहें-रहें या नहीं रहें,
यह देश रहे आबाद, देश आजाद रहे।
--०००--
भाग- 26
उपसंहार
युग-ध्वनि
आजाद, महाभारत का भीषण शंखनाद,
गूँजता सदा युद्धोन्माद का घोष रहा।
उसकी साँसों ने देश-भक्ति के स्वर फूँके,
जुल्मों के प्रति जलता उसका आक्रोश रहा।
आजाद, भँवर वन बैठा जीवन-धारा का,
वह कायरता के कलुष डुबाया करता था।
वह जीवन का बैताल, सजग विक्रम करता,
वह अनाचर में आग लगाया करता था।
आजाद, भयंकर चक्रवात संकल्पों का,
वह अन्यायों की धूल उड़ाया करता था।
अत्याचारी व्यक्तित्वों को करने निढाल,
उसका यौवन रस्सियाँ तुड़ाया करता था।
आजाद, क्षुब्ध सागर का उठता हुआ ज्वार,
थे शासन के जलपोत डगमगाया करते।
उसकी प्रचण्डता का कोई प्रतिरोध न था,
कानून, आग ही उसकी भड़काया करते।
आजाद, हिमालय अडिग उच्च आदर्शों का,
वीरता सदा उसकी अविजित ऊँचाई थी।
भारत-माता के लिए काम आऊँगा मैं,
यह गंगा उसने दोनों हाथ उठाई थी।
आजाद, वीरता के तर्कश का क्रुद्ध तीर,
निर्दिष्ट लक्ष्य का सदा अचूक निशाना था।
आजादी का अभिषेक रक्त से होता है,
यह मर्म, धर्म जैसा उसने पहचाना था।
आजाद, कड़कता हुआ क्रुद्ध वह घन था, जो,
अरि पर खूनी बिजलियाँ गिराया करता था।
वह मुर्दों में संचार खून का करता था,
उनमें जीवन की ज्योति जगाया करता था।
आजाद, भावनाओं का वह भूकम्प विकट,
उस धक्के से साम्राज्यवाद थरथरा उठा।
आजाद वज्र का था ऐसा आघात प्रबल,
अत्याचारों का पर्वत भी चरमरा उठा।
आजाद, फूटता हुआ भयंकर ज्वाला-गिरि,
हम जिसे खून कहते, वह क्रोधित लावा था।
वह दानव-सा दुर्दान्त दस्यु भी दहल गया,
ऐसा भीषण उस महावीर का धावा था।
आजाद, हिन्द के बलिदानों का स्वर्ण-लेख,
जो गर्म खून से गौरव-लिपि में लिखा गया।
भारत के बेटे आजादी के पर्वाने,
यह सत्य, सूर्य जैसा चमका कर दिखा गया।
आजाद, देश की आजादी का वह रहस्य,
जिसने जाना, वह बना देश का दीवाना।
जो जान न पाया, उस कृतघ्न का क्या कहना,
है अर्थहीन उसका जग में आना-जाना।
आजाद प्रेरणा-स्रोत अमर हर पीढ़ी का,
धरती की आजादी प्राणों से प्यारी हो।
यौवन अंगारों से अपना शृंगार करे,
हर फूल वज्र, हर कली कराल कटारी हो।
--०००--
-श्रीकृष्ण सरल
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